Geography

मिट्टी (Soil) : मिट्टी की परिभाषा, मिट्टी का वर्गीकरण

मिट्टी (Soil)

पृथ्वी की ऊपरी परत को मिट्टी (Soil) कहते हैं। जो चट्टानों के टूटने-फूटने या वनस्पतियों के सड़ने-गलने के फलस्वरूप बनती है। मृदा में रंग व गुणों के आधार पर भिन्न-भिन्न सतहें दिखाई पड़ती हैं, जिसे मृदा सतहें दिखाई पड़ती हैं जिसे मृदा-परिच्छेदिका या मृदा संस्तर (Soil Profile) कहते हैं।

पृथ्वी पर मृदा का निर्माण, विकास व उसके विभिन्न संघटकों का अध्ययन मृदा विज्ञान (Pedology) कहलाता है।

ह्यूमस (Humas) तत्व हरे कार्बनिक पदार्थो के सड़ने-गलने से बनते हैं। मुख्यतया ह्यूमस तत्वों की उपस्थिति के कारण ही मृदा सरन्ध्र (Porous) होती है।

मिट्टी के सरन्ध्र होने के कारण ही उसमें आक्सीजन, नाइट्रोजन, वायु, सूक्ष्म जीवों जैसे- प्रोटोजोआ, बैक्टीरिया, अलगी आदि की उपलब्धतां होती है।

मिट्टी का वर्गीकरण (Soil Taxonomy or Classification)

मृदा का वर्गीकरण करने की कई विधियाँ है परन्तु पेडलफर व पेडोकल 2 मुख्य मिट्टियाँ हैं। पेडलफर 63.5 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाई जाती है, जबकि पेडोकल इससे कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलती है। ये मिट्टियाँ पुनः अन्य कई उपवर्गो में विभक्त की जाती है। पेडलफर के वर्ग की अनेक मिट्टिया हैं।

1. टुण्ड्रा मिट्टी (Tundra Soil)

टुण्ड्रा प्रदेश में अत्यधिक शीत के कारण पेड़-पौधे नहीं उगते जिसके कारण यहाँ की मिट्टी में वनस्पति के अंश की कमी होती है। परन्तु विरल वनस्पति के धीरे-धीरे नष्ट होने से इसमें ह्यूमस बहुत होता है। इसमें चट्टानी चूर्ण की अधिकता होती है।

2. पोडसोल (Podsols)

यह राख-सलेटी रंग की होती है जो कोणधारी उच्च अक्षांशीय प्रदेशी में पाई जाती है। इन प्रदेशों में लम्बी शीत ऋतु, छोटी ग्रीष्म ऋतु व पूरे वर्ष सामान्य वर्षा होती है। उपजाऊ तत्व निरन्तर रिस-रिसकर नीचे जाते रहते है, जिसे अपक्षालन कहते हैं।

3. लाल-पीली मिट्टी (Red and Yellow Soil)

यह उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में उच्च तापमान व अधिक आर्द्रता होती है। इसलिए इसके घुलनशील तत्वों का सम्मिश्रण होता रहता है। इसमें लोहे के अंश अधिक होते हैं जिस कारण इसका रंग लाल हो जाता है। इस मिट्टी में चीड़ के पेड़ उगते हैं। यह मृदा संयुक्त राज्य अमेरिका में टैक्सास से अटलांटिक तट तक भारत व दक्षिणी-पूर्वी एशिया के अन्य कई भागों एवं मध्य दक्षिणी अमेरिका में पाई जाती है।

4. लैटराइट मिट्टी (Laterite Soil)

यह मिट्टी भूमध्य रेखीय एवं सवाना जलवायु वाले क्षेत्रों में पाई जाती है। यहाँ की जलवायु उष्ण व आर्द्र होती है। अधिक वर्षा के कारण बहुत से उपजाऊ तत्व रिसकर नीचे चले जाते हैं। इस प्रकार यह मृदा बहुत ही अपक्षालित होती है, जिसमें ह्यूमस का पूर्णतया अभाव होता है। इस मिट्टी की ऊपरी परत में लोहे व अल्यूमीनियम ऑक्साइड के निक्षेप मिलते हैं। इस पदार्थ को लेटराइट कहते हैं व इस प्रकार के मृदा निर्माण को लेटेराइरीकरण कहा जाता है।

5. शरनोजम मिट्टी (Chernozem Soil)

यह पेडोकल वर्ग की बहुत ही महत्वपूर्ण मिट्टी है। इसका अन्य नाम काली मृदा है। यह अर्ध मरुस्थलीय जलवायु में होती है। इसमें ह्यूमस व कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है। वर्षा कम होने के कारण इस मिट्टी का अपक्षालन नहीं होता। वाष्पीकरण अधिक होने के कारण वृक्ष नहीं उगते। जिसके कारण इसे रोटी की टोकरी भी कहते हैं।

6. प्रेयरी मिट्टी (Prairie Soil)

यह मिट्टी भी पेडोकल मृदा के समान ही है। यह मिट्टी पूर्वी यूरोप व संयुक्त राज्य अमेरिका के समशीतोष्ण घास के मैदानों में पाई जाती है। मक्का इस मृदा की मुख्य फसल है।

7. चेस्टनट मिट्टी (Chestnut Soil)

यह भी शरनोजम से मिलती-जुलती मिट्टी है। इसमें ह्यूमस कम होते है। यह मृदा उत्तरी अमेरिका व एशिया के अर्ध-शुष्क प्रदेशों में पाई जाती है। यह पशुओं के लिए चरागाह प्रदान करती है।

8. उष्ण कटिबन्धीय काली मिट्टी (Tropical Soil)

उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में मैग्मा से निर्मित काली मिट्टी का विकास हुआ है। इस प्रकार की मिट्टी भारतीय प्रायद्वीय के उत्तर-पश्चिमी भाग में (विशेषतया महाराष्ट्र में) पाई जाती है। जहाँ यह रेगर के नाम से प्रसिद्ध है। भारत में कपास उत्पन्न करने वाला मुख्य क्षेत्र इसी मिट्टी पर विकसित हुआ है। यह मृदा कीनिया, मोरक्को उत्तरी अर्जेंटीना व पश्चिमी द्वीप समूह के कुछ-कुछ भागों में भी पाई जाती है।

9. मरुस्थलीय मिट्टी (Desert Soil)

मरुस्थलीय मिट्टी समशीतोष्ण क्षेत्रों में धूसर रंग की व उष्ण क्षेत्रों में लाल रंग की होती है। इन क्षेत्रों में वर्षा कम व तापमान एवं वाष्पीकरण अधिक होता है। इन मिट्टियों का अपक्षालन नहीं होता है ये क्षारीय मिट्टियों होती है। इन क्षेत्रों में वनस्पति का अभाव होता है, जिसके कारण इन मिट्टियों में ह्यूमस की मात्रा कम होती है।

मिट्टिीयों का नया वर्गीकरण (New Classification of Soils)

1. एन्टीसॉल (Entisol)

यह मिट्टी पुरी तरह से विकसित नहीं होती है। अतः मृदा संस्तरों का पूरा विकास नहीं होता है।

2. वर्गीसॉल (Vertisol)

इस मिट्टी में क्ले (Clay) की मात्रा अधिक होती है। यह मिट्टी वर्षा होने पर फैलती है जबकि सूख जाने पर सिकुड़ती है। इस मिट्टी का विस्तार पश्चिमी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, भारत व ऑस्ट्रेलिया में मिलता है। इस मृदा में आर्द्रता धारण सामर्थ्य अधिक होती है।

3. एरीडीसॉल (Aridisol)

यह मिट्टी सहारा पश्चिमी एशिया, गोबी मरुस्थलीय क्षेत्र, दक्षिण पश्चिमी अमेरिका आदि में पाई जाती है। वास्तव में यह कम जैव पदार्थो व अधिक क्षार वाली रेगिस्तानी मृदा है।

4. मॉलीसॉल (Mollisol)

यह चेरनोजेम मिट्टियों के समतुल्य है, जिसका विस्तार स्टेपी व प्रेयरी क्षेत्रों में है। इसकी मृदा मुलायम व गोलाकार बनावट की होती है।

5. इन्सेप्टीसॉल (Inceptisol)

यह एक प्रकार की नई मिट्टी है, जिसकी मृदा परिच्छेदिका पूर्णतः विकसित नहीं होती है। इसमें एल्युमिनियम व लोहे की कमी होती है।

6. स्पोडोसॉल (Spodosol)

पॉडजॉल मिट्टयां स्पोडोसॉल के समतुल्य है। ये मिट्टियाँ कोणधारी वनों वाले क्षेत्रों में मिलती हैं, यथा उत्तरी यूरोप व उत्तरी अमेरिका। यहाँ पर सिलिकेट को छोड़कर अन्य धनायनों व धात्विक तत्वों का निक्षालन तीव्रता से होता है। यहाँ कम तापमान होने से जैव प्रक्रियाएँ भी कम है। स्पोडोसॉल साधारणतः अम्लीय है, जिसका E संस्तर राखीय (Ashy) व B संस्तर को लाइडी है।

7. अल्टीसॉल (Alfisol)

यह एक तरह का निम्न स्तर का चेरनोजेम है जो कि अमेरिका के पर्णपाती वनों, पूर्वी ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका के दक्षिणी भाग, दक्षिण पूर्व एशिया व भारत में पायी जाती है। यह नमीयुक्त व भूरे सतह वाली खनिज युक्त मिट्टी है।

8. अल्टीसॉल (Ultisol)

यह लाल, पीली, पॉडजॉल व लैटेराइट के समतुल्य है। इसका विस्तार दक्षिण पूर्व अमेरिका, दक्षिण-पूर्व एशिया, उत्तर-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया आदि में है। अल्टीसॉल एक तरह की ऋतु क्षरित अम्लीय मृदा है, जिसमें लोहे के ऑक्साइड के कारण लाल क्षैतिज संस्तर पाया जाता है। यह कभी-कभी सवाना क्षेत्रों में भी मिलती है।

9. ऑक्सीसॉल (Oxisol)

इसका विस्तार उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में यथा उत्तरी ब्राजील, मध्य अफ्रीका, दक्षिण-पूर्वी एशिया आदि में मिलती है। ऑक्सीसॉल बहुत गहराई तक ऋतु क्षरित होता है। भारी होने के कारण सिलिकेट नीचे के संस्तरों में चले जाते है। लोहे व एल्युमिनियम के ऑक्साइड ऊपर के संस्तर में ही रह जाते है।

10. हिस्टोसॉल (Histosol)

हिस्टोसॉल एक तरह की दलदली मिट्टी है। इसे बॉग मिट्टी कहते हैं। इस मिट्टी में क्ले (Clay) की मात्रा कम होती है।

पारिस्थितिकीय आधार पर मृदा के प्रकार

1. अवशिष्ट मृदा (Resifual Soil):

वह मृदा जो बनने के स्थान पर ही पड़ी रहती है, उसे अवशिष्ट मृदा कहते है।

2. वाहित मृदा (Transported Soil):

वह मृदा जो बनने वाले स्थानों से बहकर आयी हुई होती है, उसे वाहित मृदा कहते है।

3. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil):

वह मृदा जो बनने के स्थान से जल द्वारा बहकर दूसरे स्थान पर पहुँचती है।

4. वातोढ़ मृदा (Eoilan Soil):

वह मृदा जो बनने के स्थान से हवा के द्वारा उड़कर दूसरे स्थान पर पहुँचती है।

5. शेल, मलवा मृदा (Colluvial Soil):

वह मृदा जो पृथ्वी के आकर्षण शक्ति के द्वारा दूसरे स्थान पर पहुँचती है।

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