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गंगोत्री gangotri

गंगोत्री

यह प्रकृति सृष्टि निमार्ता की अदभुत कल्‍पना है । सृष्टि निमार्ता ने अपनी प्राकृतिक कल्‍पना को पार्वती की सुरम्‍य घाटियों में मूर्तिमान कर दिया है। पर्वतों और उसकी सुरम्‍य घाटियों के सौंदर्य पर रीझकर देवगण भी स्‍वर्गलोक से आकर यहां निवास करने लगे थे। हिमालय की सुरम्‍य घाटी में उत्‍तरकाशी ऐसा ही मनोरम स्‍थल है जहां देवाधिदेव शंकर का निवास है। भगवती भागीरथी जहां असि-वरूणा से अठखेलियां करती है। य‍हां के शांत वातावरण में मानव मन सर्वज्ञ की अनिर्वचनीय का अनुभव करता है। इसका प्राचिन नाम बाडाहाट था ।
 
गंगोत्री,gangotri
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गंगोत्री :- 

 

 केदारखण्‍ड के चारों धामों में यमुनोत्री की यात्रा के पश्‍चात गंगोत्री की यात्रा करने का विधान है । परमपावनी गंगा का स्‍वर्ग से अवतरण इसी पुण्‍यभूमि पर हुआ था । सर्वप्रथम गंगा का अवतरण होने के कारण यह स्‍थान गंगोत्री कहलाया। उत्‍तरकाशी जनपद में स्थित गंगोत्री समुद्र तल से 3048 मीटर की उंचाई पर ऋषिकेश से 255 किमी उतर तथा उत्‍तरकाशी से 99 किमी उत्‍तर -पूर्व में स्थित है। यहा भागीरथी का एक मंदिर है जिसमें गंगा, लक्ष्‍मी, पार्वती व अत्रपूर्णा देवी की मूर्तियां स्‍थापित हैं। कहा जाता है कि यहा राजा भगीरथ ने स्‍वर्ग से गंगा को पृथ्‍वी पर लाने के लिए व अपने पुरखों सगर के 60,000 पुत्रों के उद्धार के लिए कठोर तपस्‍या की थी व स्‍वर्ग  से पृथ्‍वी पर भगवान उतरती गंगा को इसी स्‍थान पर भगवान शिव ने अपनी जटाओं में बॉधा था । प्राचीन काल में गंगोत्री की यात्रा बहुत कठिन समझी जाती थी । किन्‍तु वर्तमान में यातायात की सुविधा होने के कारण  यह यात्रा बहुत सरल हो गई है।

·      इस मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्‍दी में लगभग 250 वर्ष पूर्व गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने कराया तथा इसका पुनरूद्धार जयपुर के राजा माधो सिंह ने कराया था ।
·      यहा के अन्‍य निकट दर्शनीय स्‍थलों में सूर्य कुंड, गौरीकुंड , पंतनाग एवं भैरव झाप स्थित है। यहां एक जल में डूबा हुआ शिवलिंग है । गंगोत्री में भागीरथी में केदार गंगा नदी मिली है । 
गंगोत्री,gangotri
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मंदिर के कपाट बंद व खुलने होने का समय :-

इस मंदिर के कपाट प्रतिवर्ष अप्रैल-मई में अक्षय तृतीया को खुलते हैं और इस दिन मॉ गंगा की डोली उनके शीत ऋतु प्रवास मुखवा ग्राम के मार्कण्‍डेय मंदिर से गंगोत्री के लिए रवाना होती है। और दिवाली के दिन मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं। इस दौरान मंदिर की मूर्तियां मुखबा में रखी जाती हैं। जहां पूजा-अर्चना होती है। गंगात्री मंदिर के निकट अन्‍य पूजा स्‍‍थल भी हैं । 
 
गंगोत्री,gangotri
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गोमुख (18 किमी ) :-  

 गोमुख हिमनद भागीरथी नदी का उद्धगम स्‍थल है । इसका नाम गोमुख इसलिए पडा क्‍योंकि हिमनद का आकार यहां गाय के मुख की तरह है यह स्‍थल गंगोत्री से 18 किमी की दूरी पर दक्षिण पूर्वी दिशा में पैदल मार्ग पर स्थित है। गोमुख से 6 किमी की दूरी पर नंदन वन  तपोवन है ।

 

केदारताल (18 किमी ) :- 

कठिन पदयात्रा के बाद हिमानी झील केदारताल के दर्शन होते है। यह झील हिमालय शिखरों के बीच एक दर्पण की तरह है जिसमें शिखरों का प्रतिबिंब झलकता है।
 

भैरोंघाटी :-

गंगोत्री से नीचे की ओर 10 किलोमीटर दूर 2743 मीटर पर सुन्‍दर स्‍थल भैरोंघाटी स्थित है । यहा भैरव बाबा का मंदिर है भगवान शिव ने इस क्षेत्र की रक्षा के लिए भैरव को यह स्‍थान दिया था।
 

कैसे पहुंचे :-
हवाई मार्ग :-

नजदीकी हवाई अडडा जौलीग्रांट देहरादून है जो देहरादून से 24 किमी, ऋषिकेश से 18 किमी तथा गंगोत्री से 275 किमी है ।
 

रेल मार्ग :-

 नजदीकी रेलवे स्‍टेशन ऋषिकेश 248 किमी दूरी पर है ।
 

सडक मार्ग :-

सडक मार्ग से देहरादून, हरिद्धार और सभी नगरों से जुडा है । य‍हा मार्ग में जगह – जगह पर ठहरने के लिए होटलों विश्राम गृह की उच्चित सुविधा उपलब्‍ध है ।
 

 

दोस्तों उत्तराखण्ड देव भूमि (देवों की तपस्थली) में जो भी आया है उसने सदेव परम् आनन्द कि प्राप्त की है इस स्थान में आने के बाद आपको समझे ऐसा प्रतीत होगा कि मानों आप ईश्वर की प्राप्ति हो गई। एक बार यहाँ आकर यहाँ की हशीन वादियों का आनंद जरूर ले।
विशेष निवेदन – कृपया देव भूमि उतराखंड को दुषित न करें  स्वच्छता का विशेष ध्यान दें अपने साथ लाए सामाग्री जैसे- खाने की सामाग्री,पॉलिथीन, तम्बाकू के कागज़, बिस्कुट के कागज़ आदि सामाग्री को अपने साथ लेकर जाइए यहाँ न फेके । 
                                                   धन्यवाद

 

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