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guidance and counseling || निर्देशन एवं परामर्श

निर्देशन एवं परामर्श (guidance and counseling)

guidance and counseling (निर्देशन एवं परामर्श) – शब्द अँग्रेजी के गाइडेंस (Guidence) शब्द का हिन्दी अनुवाद है, जिसका मार्गदर्शन से काफी समानता है। सामान्यतः इसका प्रचलित अर्थ सुझाव देना या सलाह देना है। किन्तु क्रो एंड क्रो का विचार है कि यह एक व्यक्ति के दृष्टिकोण को दूसरे पर लादने की प्रक्रिया नहीं है। निर्देशन में व्यक्ति स्वयं ही प्रधान माना जाता है। व्यक्ति स्वयं अपने बारे में निर्णय करता है।

निर्देशन वास्तव में एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति को उसकी समस्याओं के समाधान के लिए विशेष प्रकार की सहायता प्रदान की जाती है जो व्यक्तिगत रूप से योग्य और पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा किसी भी आयु के व्यक्ति को उसके जीवन कार्यों का प्रबन्ध करने, उसके अपने दृष्टिकोण का विकास करने, अपना निजी निर्णय करने और स्वयं की समस्याओं को हल करने के लिए दी जाती है। निर्देशन वह विधियाँ बतलाता है जिनका प्रयोग करके व्यक्ति समायोजन की समस्याओं को स्वयं सुलझा सकता है तथा इसके द्वारा व्यक्ति को अपनी क्षमताओं, योग्यताओं से परिचित करवाया जाता है जो उसके उद्देश्य की प्राप्ति में सहायक है।

निर्देशन किसी भी समस्या का समाधान स्वयं नहीं करता बल्कि जीवन को समस्या समाधान करने के योग्य बनाता है। यह बात ध्यान रखने की है कि निर्देशन में किस प्रकार की बाध्यता नहीं है और न ही वह किसी प्रकार का आदेश है। इसमें किसी व्यक्ति का दृष्टिकोण किसी अन्य व्यक्ति को प्राप्त होने वाली सहायता है जो उसके जीवन को व्यवस्थित करने और उसके दृष्टिकोण को विकसित करने में सहायक होती है। इस प्रकार निर्देशन का केन्द्र बिन्दु व्यक्ति होता है, उसकी समस्या नहीं।

निर्देशन व्यक्ति की क्षमता व योग्यताओं का अध्ययन पहले करता है। बाद में समस्या का। संक्षेप में यह वह क्रिया है जो व्यक्ति को आत्मदर्शन करने तथा आत्म शक्ति का समुचित सहयोग करने में सहायता प्रदान करती है। निर्देशन की कुछ परिभाषाओं को हम निम्नांकित रूप से देख सकते हैं-

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स्किनर के अनुसार, “निर्देशन युवकों को स्वयं से अन्य से और परिस्थितियों से सामंजस्य करना एवं सीखने के लिए सहायता देने की प्रक्रिया है।”

आर्थर जे. जोन्स के मतानुसार, “व्यक्तियों को बुद्धिमतापूर्वक चुनाव के समायोजन करने में दी जाने वाली सहायता ही निर्देशन है ”

क्रो एंड क्रो के अनुसार, ” निर्देशन लक्ष्य करना नहीं है, यह अपने विचार को दूसरे पर लादना नहीं है, यह उन निर्णयों का जिन्हें एक व्यक्ति को अपने लिए स्वयं लेना चाहिए, निश्चित करना नहीं है, यह दूसरों के जीवन के दायित्वों को अपने ऊपर लेना नहीं है वरन् निर्देशन वह सहायता है जो एक कुशल परामर्शदाता द्वारा किसी भी आयु के व्यक्ति को अपना जीवन निर्देशित करने, अपना दृष्टिकोण विकसित करने, स्वयं निर्णय लेने तथा उत्तरदायित्व संभालने के लिए की जाती है।”

यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ एजूकेशन (United States of Education) के अनुसार, “निर्देशन किसी व्यक्ति की प्राकृतिक शक्तियों की खोज करने के लिए विशिष्ट प्रशिक्षण की विभिन्न विधियों से अवगत कराने वाली प्रक्रिया है ताकि व्यक्ति अपने जीवेन को अपने और समाज के अधिकतम हित के लिए बना सके।”

चाईशोम के अनुसार, “रचनात्मक उपक्रम तथा जीवन से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान की व्यक्ति में सूझ विकसित करना निर्देशन का उद्देश्य है ताकि वह जीवन भर अपनी समस्याओं का समाधान करने के योग्य बन सके।”

एमरीस्टूप्स के अनुसार, “व्यक्ति को स्वयं तथा समाज के उपयोग के लिए स्वयं की क्षमताओं के अधिकतम विकास के प्रयोजन से निरन्तर दी जाने वाली सहायता ही निर्देशन है।”

भट्टाचार्य के अनुसार, “परामर्श व्यक्ति की स्व-प्रत्यय विकसित करने में सहायता करने की वह प्रक्रिया है, जिसमें वह वास्तविकता यथार्थ की तुलना में अपने प्रत्यय की परख करता है, यथार्थ के अनुरूप अपने को ढालता है, जिसमें स्वयं उसका और समाज का भला है।”

जी.ई. स्मिथ ने निर्देशन की परिभाषा में निर्देशन को समायोजन में सहायक मानते हुए लिखा है, “निर्देशन विभिन्न क्षेत्रों में संतोषकजनक समायोजन के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल प्राप्त करने में सहायक विभिन्न सेवाओं का समूह है ताकि इसके लिए आवश्यक व्याख्याएँ, योजनाएँ तथा उपयुक्त चयन किए जा सकें।”

जे.एम. ब्रिवर ने निर्देशन की परिभाषा में स्व-निर्देशन पर बल देते हुए बताया है, “निर्देशन एक ऐसा प्रक्रम है जो व्यक्ति में अपनी समस्याओं के प्रति स्वयं निर्देशन की क्षमता का विकास करता है।”

बरनार्ड एवं फुलमर ने निर्देशन की व्याख्या करते हुए लिखा है “निर्देशन के अन्तर्गत वे सभी क्रियाएँ आ जाती हैं जो व्यक्ति की आत्म सिद्धि में सहायक होती हैं।”

लीफियर, टसेल एवं विद्धिल के अनुसार, “निर्देशन एक शैक्षिक सेवा है जो विद्यालय में प्राप्त दीक्षा का अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली उपयोग करने में विद्यार्थियों की सहायता प्रदान करने के लिए आयोजित की जाती है।”

स्टीफेलरी, बफोर्ड तथा स्टीवार्ट ने निर्देशन की विस्तृत परिभाषा दी है। निर्देशन समस्या समाधन हेतु चयन एवं समायोजन निर्धारण हेतु, एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को दी गई सहायता है। निर्देशन का लक्ष्य ग्रहणकर्ता में अपनी स्वतंत्रता तथा अपने प्रति उत्तरदायित्व की भावना का विकास है। यह एक सार्वभौमिक सेवा है जो कि केवल शिक्षालय या परिवार तक सीमित नहीं है।

यह जीवन के सभी पक्षों-घर, व्यापार, उद्योग, शासन, सामाजिक जीवन, चिकित्सालय, कारागार में व्याप्त है। वास्तव में इसका अस्तित्व उन सभी स्थानों में है जहाँ व्यक्ति जो कि सहायता चाहते हैं और जहाँ ऐसे लोग हैं जो सहायता दे सकते हैं।

रूथ स्ट्रांग के अनुसार, “निर्देशन के अन्तर्गत वे सभी क्रियाएँ आ जाती हैं जो व्यक्ति की आत्मसिद्धि में सहायक होती हैं।”

मेथ्यूसन के अनुसार, “निर्देशन किसी व्यक्ति को शिक्षा एवं व्याख्यात्मक विधियों के द्वारा सहायता देने की क्रमबद्ध व्यवसायिक प्रक्रिया है। जिसके द्वारा उस व्यक्ति की विशेषताओं और शक्तियों को श्रेष्ठ ढंग से समझाया जा सके तथा उसे सामाजिक आवश्यकताओं और अवसरों के साथ सामाजिक और नैतिक मूल्यों के अनुसार संतोषजनक ढंग से जोड़ा जा सके।”

स्टूडेंट सर्विसेज मैनुअल के अनुसार, “परामर्श के अन्तर्गत एक प्रशिक्षित परामर्शदाता की उस विद्यार्थी के लिए की गई सहायता आती है जो कि विद्यालय जीवन में समंजन की समस्याओं का सामना कर रहा है। परामर्श आमने-सामने का सम्बन्ध है, जिसमें परामर्शदाता पदामर्शपेक्षी को सीखने की स्थिति उपलब्ध कराता है। इसमें वर्तमान तथा भविष्य के पहलुओं सहित स्वयं को समझने में विद्यार्थी की सहायता की जाती है,

जिससे वह अपनी योग्यताओं व क्षमताओं का प्रयोग स्वयं तथा अपने समूह के लिए कर सके। परामर्श-साक्षात्कार में विद्यार्थी के परामर्शदाता के साथ सक्रिय भाग लेने तथा उसका निश्चय करने की उस आजादी पर बल होता है जिसके द्वारा वह निर्णय कर सके कि उसे क्या करना चाहिए तथा अपने किए निर्णयों के परिणामों का सामना करने का दायित्व भी संभाल सकें। अतः परामर्शदाता व्यक्ति को प्रौढ़ बनाने में सहायता देता है।”

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उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि –

1. निर्देशन व्यक्ति को अपने उत्तरदायित्व स्वयं समझने व संभालने का मार्ग को खोज निकालने में व्यक्ति को सहायता देने की प्रक्रिया है।

2. निर्देशन व्यक्ति की योग्यताओं, रुचियों और क्षमताओं का विकसित करने में सहयोग देता है।

3. निर्देशन से व्यक्ति स्वयं की क्षमताओं और योग्यताओं से परिचित होता है।

4. निर्देशन सतत् चलने वाली प्रक्रिया है। व्यक्ति को इसकी आवश्यकता जीवन में कभी भी किसी भी प्रसंग में पड़ सकती है।

5. निर्देशन एक ऐसा साधन है जिससे व्यक्ति का भावी विकास उसकी आवश्यकताओं तथा व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर किया जाता है।

6. निर्देशन किसी भी समस्या का समाधान स्वयं नहीं करता बल्कि व्यक्ति को समस्या समाधान के लिए योग्य बनाता है।

7. निर्देशन व्यक्ति को स्वयं निर्णय लेने के लिए प्रेरित करता है।

8. निर्देशन का लक्ष्य बाह्य और आन्तरिक परिवेश में समायोजन करना है।

9. निर्देशन से व्यक्ति का दृष्टिकोण विस्तृत होता है।

10. निर्देशन प्रक्रिया द्वारा समस्याओं में उलझे व्यक्ति की सहायता किसी योग्य व्यक्ति द्वारा की जाती है।

11. निर्देशन सहायता है न कि सलाह।

12. निर्देशन का उद्देश्य केवल जानकारी नहीं बल्कि जानकारी सहित सुझाव व सहायता है।

13. निर्देशन व्यक्ति व समाज दोनों के लिए हितकारी है।

निर्देशन के समानार्थी शब्द (Same Means Word of guidance)

निर्देशन के कुछ समानार्थी प्रतीत होने वाले शब्द कुछ ऐसे हैं जो निर्देशन के कुछ समानार्थी प्रतीत होते हैं। इसलिए बहुत बार इन्हें निर्देशन की जगह काम में लिया जाता है। वास्तव में निर्देशन और इन समानार्थी प्रतीत होने वाले शब्दों में अन्तर है जिसको हम निम्नलिखित प्रकार से देख सकते हैं-

1. निर्देशन एवं अनुदेश : यह सच ही है कि शालीय अनुदेश-सेवाओं के द्वारा भी व्यक्ति को निर्देशन दिया जाता है किन्तु अनुदेश द्वारा दिए गए निर्देशन को एक निर्धारित सीमा में होना अपेक्षित है, जबकि निर्देशन को समय के बंधन में नहीं बाँध जा सकता है। एकक व्यक्ति की विशिष्ट आवश्यकताओं के संदर्भ में व्यक्ति केन्द्रित निर्देशन का कार्य अपनी गति से चलाता है।

2. निदेशक एवं परामर्शदाता : कुछ विद्वान एवं निदेशक एवं परामर्शदाता समानार्थी हैं लेकिन दोनों शब्दों में अन्तर है। परामर्श का शाब्दिक अर्थ है राय देना जबकि निर्देशन के प्रक्रम में प्रत्यक्ष रूप से कोई निश्चय लेने हेतु राय नहीं दी जाती। निर्देशन एक व्यापक शब्द है, परामर्श निर्देशन में समाहित होता है। ट्रेक्सलर ने लिखा है कि “निर्देशन एवं परामर्श दोनों एकार्थवाची शब्द नहीं हैं। परामर्श निर्देशन में समाविष्ट है। परामर्श की प्रक्रिया में साक्षात्कार एवं मूल्यांकन का – प्रयोग साधन के रूप में होता है।”

3. निर्देशन एवं मार्गदर्शन : मार्गदर्शन का अर्थ है-किसी अन्य विशेषज्ञ द्वारा अज्ञात क्षेत्र के सम्बन्ध में बताना, जैसे विदेशी पर्यटकों को कई मार्गदर्शक (Guide) उदयपुर का किला दिखलाए तथा उसके सम्बन्ध में बतलाए। जबकि निर्देशन में व्यक्ति में ही इतनी योग्यता विकसित की जाती है कि वह स्वयं उन रास्तों और बातों को जानें। निर्देशन में स्वदर्शन विकसित किया जाता है जबकि मार्गदर्शन में नहीं।

4. निर्देशन एवं निदेशन : निर्देशन (To Direct) से तात्पर्य कार्य करने के लिए कहना, आदेश देना है। निदेशन सामान्यतः कार्यालयों में अधिकारियों द्वारा अपने कर्मचारियों को दिया जाता है। शाब्दिक डाइरेक्शन (निदेशन) शब्द में आदेश व अधिकार की भावना निहित रहती है, जिसकी ‘गाइडेंस’ (निर्देशन) शब्द के विकासमान दर्शन से न केवल असंगति अपितु प्रत्यक्ष विरोधिता है, क्योंकि ‘गाइडेंस’ (निर्देशन) में आदेश या अधिकार जैसा कुछ नहीं होता, वहाँ तो आत्म निर्देशन होता है।

इरिकसन के अनुसार,एक परामर्श साक्षात्कार व्यक्ति से व्यक्ति का सम्बन्ध है, जिसमें व्यक्ति अपनी समस्याओं तथा आवश्यकताओं के साथ दूसरे व्यक्ति के पास सहायतार्थ जाता है।” इस प्रकार एक छात्र की साक्षात्कार एवं व्यक्तिगत सम्पर्क से सहायता की जाती है जो निर्देशन में समाहित है।

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निर्देशन के प्रकार (Types of guidance)

सूचना एवं प्रौद्योगिकी के आज के युग में जीवन में सभी क्षेत्रों में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं। उद्योगों और व्यवसायों में विविधता के दर्शन तो होते हैं, साथ ही पुराने उद्योग और व्यवस्था या तो नष्ट हो गए हैं या उनका स्वरूप बदल गया है। समाज में पुरानी परंपराएँ जो रूढ़ियाँ बन चुकी थीं वे प्रायः नष्ट हो गईं या नष्ट होने के कगार पर हैं या उनके अपेक्षित सुधार होकर उनमें स्वरूप में बदलाव आ गया है। हमारे देश में समाज की महत्त्वपूर्ण इकाई परिवार की अवधारणा में काफी बदलाव आया है। संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ने ले ली है। आज व्यक्ति के जीवन में अर्थ (धन) का महत्त्व अधिक हो गया है।

आज के युग को ‘उदारीकरण’ या ‘भूमण्डलीकरण’ या विश्वग्राम की अवधारणा से अभिहित किया जा रहा है और यह सूचना और प्रौद्योगिकी से ही संभव हो पाया है। आज इराक में होने वाले युद्ध का प्रभाव भारत पर भी पड़ता है। यह प्रभाव केवल राजनैतिक ही नहीं आर्थिक और मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक दृष्टि से भी देखा जा सकता है। सूचना के विस्फोट के चलते आज विश्व की सभी संस्कृतियाँ एक-दूसरे के मध्य संप्रेषित हो रही हैं और अपना प्रभाव जमा रही हैं। सूचना और ज्ञान के विस्फोट के चलते ही ज्ञान का विशिष्टीकरण हुआ है जिसके चलते शिक्षा और व्यवसाय मानव के सामने बहु-वैकल्पिक रूप से आए हैं।

सूचना और ज्ञान का यह विस्फोट इतना तीव्र है कि ज्ञान की संरचना, उसके उपयोग, प्रासंगिकता एवं व्यवसायों के स्थायित्व को उसने संदिग्ध बना दिया है। आज इस बात में कोई दो राय नहीं है कि व्यक्ति के जीवन की परिधि व्यापक हो गई है लेकिन इस परिधि की व्यापकता के साथ समस्याएँ भी बहुमुखी हो गई है।

आज व्यक्ति अपनी इन विविध समस्याओं को भली प्रकार समझने और हल करने में सक्षम नहीं है। परिणामस्वरूप मनुष्य निर्देशन की आवश्यकता महसूस करता है। मानव जीवन के विविध क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए विद्वान् एकमत नहीं है। मोटे रूप में विभिन्न वैज्ञानिकों ने जितने भी प्रकार बताए हैं, उनको हम निम्नांकित प्रकार से विभाजित कर सकते हैं-

(क). स्टार्टअप निर्देशन

(ख). व्यवसायिक निर्देशन

(ग). व्यक्तिगत निर्देशन

इन तीनों को हम निम्नलिखित प्रकार से समझ सकते हैं-

(क). शैक्षिक निर्देशन

विद्यालय तथा महाविद्यालय में विषयों तथा पाठ्यक्रम के चुनाव में विद्यार्थियों को दिया जाने वाला निर्देशन शैक्षिक निर्देशन कहलाता है। विभिन्न विद्वानों ने इसकी अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं। कुछ प्रचलित परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

रूथ स्ट्रेंग के अनुसार, “व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का मुख्य उद्देश्य छात्र को उपयोगी कार्यक्रम का चयन तथा उनमें प्रगति करने में सहायता देना है।”

बूअर के अनुसार, “शैक्षिक निर्देशन व्यक्ति को बौद्धिक विकास में सहायता करने का सचेत प्रयास है। यह ऐसी तकनीक है जिसका शिक्षण में भी उपयोग होता है अथवा यह भी कहा जा सकता है कि सीखना निर्देशन के अन्तर्गत आ सकता है।”

जॉन्स के अनुसार, “सीखने की प्रक्रिया में जहाँ कहीं अध्यापक बालक की सीखने में मदद करता है वहीं निर्देशन को विद्यमान समझना चाहिए।”

जी.ई. मायर्स के अनुसार, “शैक्षिक निर्देशन ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति के लिए तथा समाज की दृष्टि में सभी प्रकार से उपयुक्त शैक्षिक कार्यक्रम की योजना बनाई जाए, योजनानुसार चलने में व्यक्ति की सतत सहायता की जाए तथा उन संकेतों के आधार पर व्यक्ति को उस वातावरण में ढालकर सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया जाए।”

उपर्युक्त सभी परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि बालकों की रुचि, क्षमता, योग्यता आदि विभिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए बालकों के विकास की योजना बनानी चाहिए तथा उन्हें इसी आधार पर सीखने में सहायता देनी चाहिए, यही शैक्षिक निर्देशन है।

(ख). व्यावसायिक निर्देशन

“गोल कील गोल छिद्र में तथा चौकोर कीलें चौकोर छिद्र में डालने की प्रक्रिया व्यावसायिक निर्देशन है।” अर्थात् उपयुक्त व्यक्ति को उपयुक्त स्थान पर लगाना व्यावसायिक निर्देशन है। व्यावसायिक निर्देशन व्यवस्थित तथा अव्यवस्थित दोनों हो सकता है। विद्यालय तथा अन्य निर्देशन संस्थाओं द्वारा सोद्देश्य निर्देशन व्यवस्थित निर्देशन कहलाता है। इसके अलावा हमारे शुभचिंतकों, मित्रों, रिश्तेदारों द्वारा अनजाने या अनायास जो निर्देशन दिया जाता है, वह अव्यवस्थित होता है। व्यावसायिक निर्देशन की परिभाषाओं को हम निम्नलिखित प्रकार से देख सकते हैं-

पार्सस के अनुसार, “यह नवयुवक की उस व्यवसाय को चुनने के लिए सहायक प्रक्रिया है जिसके लिए वह तैयारी करेगा, आगे बढ़ने के लिए मार्ग ढूँढ़ेगा तथा एक दक्ष एवं सफल भविष्य के निर्माण के लिए प्रयत्नशील होगा।”

सुपर के अनुसार, “व्यावसायिक निर्देशन व्यक्तियों के व्यवसायों में समायोजित होने में सहायता करता है तथा मानवीय शक्ति को प्रभावोत्पादकता ढंग से उपयोग कर सामाजिक अर्थव्यवस्था को सरलतम ढंग से चलाने में सुविधाएँ प्रदान करता है।

अमेरिकन राष्ट्रीय व्यावसायिक निर्देशन एसोसिएशन के अनुसार, “व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति द्वारा एक व्यवसाय चुनने, उसके लिए तैयारी करने, उसमें प्रवेश पाने तथा उसमें उन्नति करने की एक प्रक्रिया है।”

अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, “व्यक्ति के गुणों तथा उनके व्यावसायिक अवसरों के साथ सम्बन्ध को ध्यान में रखते हुए व्यक्ति को व्यावसायिक चयन और उसमें प्रगति से सम्बन्धित समस्याओं को हल करने में दी जानी वाली सहायता ही व्यावसायिक निर्देशन है।”

(ग). व्यक्तिगत निर्देशन

शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन के अलावा कुछ अन्य पक्ष मानव जीवन के ऐसे हैं जिनको हम उनके व्यक्तिगत जीवन से सम्बन्धित कर सकते हैं। मानव जीवन के पक्ष मोटे रूप में सामाजिक, पारिवारिक, शारीरिक, मानसिक एवं भावात्मक हो सकते हैं। इन सभी पक्षों से जुड़ी व्यक्तिगत समस्याएँ, जैसे स्वास्थ्य, संवेग, सामाजिक सम्बन्ध, पारिवारिक सम्बन्ध, यौन, प्रेम, अवकाश, विवाह, नैतिक आदि पर केन्द्रित हो सकती है। व्यक्ति के जीवन समायोजन के लिए उपर्युक्त प्रकार की समस्याओं के समाधान के लिए जो सहायता दी जाती है वह व्यक्तिगत निर्देशन कहलाता है।

परामर्श तथा मनोवैज्ञानिक परामर्श में अन्तर : सामान्य परामर्श तथा मनोवैज्ञानिक परामर्श में अन्तर होता है। बोर्डिन का मत है कि परामर्श का सीधा सम्बन्ध तात्कालिक स्थिति के समाधान से होता है जबकि मनोवैज्ञानिक परामर्श का सीधा सम्बन्ध व्यक्तित्व के विकास से होता है। इसका ध्येय उन विघ्नों के सम्बन्ध में सोचना तथा समझना होता है जो कि व्यक्ति के भावी व्यक्तित्व के विकास की प्रक्रिया में गतिरोध उत्पन्न करते हैं तथा व्यक्ति के सक्रिय व्यक्तित्व के विकास के लिए उन्हें दूर किया जाता है।

मनोवैज्ञानिक परामर्श किसी विशेषज्ञ द्वारा ही दिया जाता है। इस प्रक्रिया में परामर्शदाता व समस्याग्रस्त व्यक्ति का आमने-सामने साक्षात्कार होता है। समस्याग्रस्त व्यक्ति वह स्वयं महसूस करता है कि वह ऐसी समस्या से ग्रस्त है जिसका समाधान वह अकेले नहीं कर सकता। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि मनोवैज्ञानिक परामर्श सामान्य व्यक्ति की व्यक्तित्व सम्बन्धी तथा समायोजन सम्बन्धी समस्याओं के लिए उपयुक्त है।

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निर्देशन के सिद्धान्त (Principles of guidance )

निर्देशन एक लचीली प्रक्रिया है। इसलिए पृथक् पृथक् विद्वानों ने निर्देशन के सिद्धान्तों की अलग-अलग संख्या मानी है। निर्देशन के सिद्धान्तों के विषय में अनेक विद्वानों में मतभेद हैं। जोन्स ने निर्देशन के पाँच सिद्धान्त, क्रो एंड क्रो ने चौदह तथा हम्फ्रीज और ट्रेक्सलर ने सात सिद्धान्तों का उल्लेख किया है। निर्देशन के ये सिद्धान्त निर्देशन के क्रियात्मक और व्यावहारिक कार्यों में सहायता करते हैं। निर्देशन कार्यक्रम की संरचना और संगठन करते समय इन सिद्धान्तों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इन सिद्धान्तों को हम निम्नलिखित प्रकार से देख सकते हैं-

1. निर्देशन का सम्बन्य मानव विकास के सभी क्षेत्रों से है : निर्देशन का सम्बन्ध मानव विकास के सभी क्षेत्रों से है, निर्देशन व्यक्ति के सर्वांगीण विकास से सम्बन्धित होता है। अतः निर्देशन के संगठन का निर्माण करते समय हमें व्यक्ति के सामाजिक, मानसिक, शारीरिक, सांर्वागिक आदि सभी पक्षों का ध्यान रखना चाहिए, निर्देशन सेवाएँ देते समय व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को ध्यान में रखना चाहिए, क्योंकि निर्देशन सेवाओं के केन्द्र में व्यक्ति होता है और व्यक्ति को टुकड़ों में नहीं बाँटा जा सकता। उसकी व्याख्या करते समय उसके व्यक्तित्व, से सम्बन्धित सभी पहलुओं पर विचार करना आवश्यक होता है। अतः निर्देशन सेवा देते समय भी इन सभी पहलुओं का ध्यान रखना चाहिए।

2. निर्देशन सम्पूर्ण शैक्षिक प्रक्रिया का अंग है : निर्देशन स्वयं में एक पूर्ण प्रक्रिया है। जिस प्रकार व्यक्ति का जीवन एक इकाई के रूप में होता है उसी प्रकार निर्देशन का सम्पूर्ण कार्य एक इकाई के समान है। कोई भी विद्यालय निर्देशन के चुने हुए अंगों को अपने यहाँ प्रारम्भ नहीं कर सकता, जिस प्रकार व्यक्तित्व को विभाजित नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार निर्देशन को विभाजित नहीं किया जा सकता। अतः निर्देशन को शैक्षिक प्रक्रिया से जोड़ना चाहिए। निर्देशन 86 को शिक्षण या शिक्षण प्रक्रिया से अलग नहीं देखा जाना चाहिए, वह उसी का एक अंग है।

3. निर्देशन जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है : निर्देशन की प्रक्रिया जीवन भर चलती है। निर्देशन की आवश्यकता किसी को भी पड़ सकती है, इसके साथ- साथ हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि निर्देशन की आवश्यकता कभी भी पड़ सकती है। अतः निर्देशन को किसी आयु विशेष तक सीमित नहीं किया जा सकता। निर्देशन सेवा जीवन भर चलती रहनी चाहिए। विद्यार्थी को अपने अध्ययनकाल में शैक्षिक निर्देशन की आवश्यकता होती है। अध्ययन के पश्चात् उसे अपने व्यवसाय के लिए व्यवसायिक निर्देशन की आवश्यकता होती है, साथ ही उसे जीवन के किसी भी स्तर पर व्यक्तिगत निर्देशन एवं परामर्श की आवश्यकता हो सकती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि निर्देशन जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है।

4. निर्देशन आत्म प्रकाशन और आत्म विकास को विकसित करता है : निर्देशन के मूल में व्यक्ति होता है, उसकी समस्या नहीं। निर्देशन में पहले व्यक्ति की योग्यताओं, क्षमताओं को जाना जाता है। बाद में उसकी समस्या पर विचार किया जाता है। निर्देशन स्वयं किसी समस्या का हल नहीं करता बल्कि समस्या के हल के व्यक्ति को तैयार करता है। निर्देशन व्यक्ति को उसकी क्षमताओं और योग्यताओं से अवगत कराता है, साथ ही समस्या की वस्तुस्थिति से भी अवगत करवाता है। वह व्यक्ति को आत्म प्रकाश एवं आत्म विकास का अवसर प्रदान करता हैं।

5. निर्देशन समाज और व्यक्ति दोनों के लिए उत्तरदायी है : निर्देशन व्यक्ति पर केन्द्रित होता है, यह सही है लेकिन वह समाज के प्रति भी उत्तरदायी होता है। निर्देशन का उद्देश्य होता है कि व्यक्ति की क्षमताओं एवं योग्यताओं को समाज के हितों में उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जा सके। शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण कार्य व्यक्ति में सामाजिक भावना का विकास करना है और निर्देशन शैक्षिक प्रक्रिया का ही एक अंग है। अतः स्वाभाविक है कि यह समाज के प्रति उत्तरदायी होगा।

6. निर्देशन विद्यार्थी, अभिभावक, अध्यापक, प्रशासन और परामर्शदाता का सहकारी कार्य होता है : निर्देशन केवल किसी विशिष्ट अधिकारी या कर्मचारी का कार्य नहीं समझना चाहिए बल्कि विद्यार्थी, अभिभावक, अध्यापक, प्रशासन तथा परामर्शदाता की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन इससे विद्यार्थी, अभिभावक, अध्यापक एवं प्रशासन का महत्त्व कम नहीं होता। निर्देशन में इन सबका सहयोग अपेक्षित है। अन्तिम निर्णय तो इसमें विद्यार्थी पर ही निर्भर है

7. निर्देशन कार्यक्रम में अधिकाँश व्यक्तियों को सामान्य व्यक्ति मानना चाहिए : बहुत बार निर्देशन कार्यक्रमों के संचालक यह गलत निर्णय ले लेते हैं कि निर्देशन की आवश्यकता केवल ऐसे व्यक्तियों को होती है जो मानसिक, सांवेगिक या शारीरिक रूप से पिछड़े हुए होते हैं। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। निर्देशन की आवश्यकता सामान्य व्यक्तियों तथा सामान्य विद्यार्थियों को भी होती है। यह अलग बात है कि पिछड़े व्यक्तियों को निर्देशन की विशिष्ट सहायता प्रदान की जाती है। अतः निर्देशन कार्यक्रम में अधिकाँश व्यक्तियों को सामान्य व्यक्ति मानकर उनके लिए निर्देशन सेवाओं में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए।

8. निर्देशन सहायता है न कि सलाह : गार्डनर व मर्फी ने कहा है कि सलाह या उपदेश देना मानव जाति की कमजोरी होती है। निर्देशन में इस बात से परहेज किया जाता है। निर्देशन के वैज्ञानिक स्वरूप के समस्त विवेचनों में सहायता शब्द पर बल दिया जाता है। यदि कहा जाए कि सहायता शब्द सम्पूर्ण निर्देशन क्षेत्र का मौलिक कुंजी शब्द है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। निर्देशन में व्यक्ति की क्षमताओं व योग्यताओं का अहसास करवाकर समस्या की वस्तुस्थिति से अवगत करवाया जाता है। यहाँ निर्देशन स्वतः समस्या का समाधान नहीं करता बल्कि समस्या के समाधान के लिए व्यक्ति को तैयार करता है। अतः निर्देशन सहायता है न कि सलाह।

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